भारत दर्शन : मनाली यात्रा


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29 अप्रैल, 2016 दिन शुक्रवार

 सुबह 05:30, टिक-टिक, टिक-टिक

अचानक आँख खुली और इतनी तेज गति से अलार्म को बंद करने के लिए उठा जैसे अगले ही पल में ज्वालामुखी फट जायेगा। अचानक याद आया कि आज तो रोज की भाँति शारीरिक प्रशिक्षण (पीटी) के लिए नहीं जाना है, अनायास ही मन इतना प्रसन्न हुआ जैसे आज तो महानिदेशक पदक ही प्राप्त कर लिया हो । इस शारीरिक प्रशिक्षण (पीटी) के रद्द होने का भी एक कारण था, पूर्व रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था एवं तत्पश्चात उत्साह से आप्लावित परिवीक्षार्थिओं का DJ कार्यक्रम भी था । मैंने पुनः अपनी शायिका की ओर देखा और ऐसा लगा जैसे वो वर्षों से मेरा इंतज़ार कर रही थी, मैंने भी बिना विलंब किए उसका आमंत्रण स्वीकार किया और हम दोनों कुछ ही क्षणों में एक दूसरे के इतने समीप हो गए, जैसे वियोग में बैठे प्रेमी को अचानक से उसकी प्रेयसी मिल गई हो ।

29 अप्रैल, 2016 दिन शुक्रवार

 सुबह 07:55

कुछ कंपन सा महसूस हुया, आँख खुली तो देखा मेरा कक्ष साथी (ROOM-MATE) मुझे जगा रहा था, मैं HIGH SPEED TRAIN (द्रुत गति रेलगाड़ी) की गति से उठा और ऐसा लगा मानो आज मेरे उदर को भारतीय रेल राष्ट्रीय अकादमी का पौष्टिक एवं स्वस्थ नाश्ता नसीब नहीं होगा । मैंने जल्दी-जल्दी में सम्पूर्ण दैनिक क्रियाएँ सम्पन्न करने की कोशिश की किन्तु प्रतिदिन की भाँति पूर्ण सफलता नहीं मिली और मैं आंशिक सफलता के साथ तुरंत मेस की तरफ इस उम्मीद से भागा कि थोड़े से भोज्य पदार्थ से अपनी क्षुधा को शांत करूंगा लेकिन प्रतिदिन की तरह आज भी पंक्ति इतनी लंबी थी कि मैंने आँखों से ही वहाँ बैठे व्यक्तिओं की थाली का दर्शन कर अपनी क्षुधा को शांत करने का निष्फल प्रयास किया, लेकिन शायद मेरे उदर को यह तरीका स्वीकार न था । अत: मैंने भी पंक्ति में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा की और उपलब्ध संसाधनों को कम से कम समय में ग्रहण करने का प्रयास किया ।

अब मैं कक्षा के अंदर प्रवेश कर चुका था और मैंने अपने बैठने की जगह भी सुनिश्चित कर ली थी, क्योंकि रोज की भाँति मैं अपने निर्धारित स्थान पर ही बैठना पसंद करता था ।

आज सुबह से ही मन बहुत रोमांचित हो रहा था क्योंकि आज शाम से हमारा बहुप्रतीछित भारत दर्शन का शिक्षा दौरा प्रारम्भ होना था और हमें मनाली जाने का अवसर प्राप्त हुआ था । अत: आज के व्याख्यानों में मन न लगना स्वाभाविक था, किन्तु मन को दिलासा देकर किसी तरह प्रथम व्याख्यान (राजभाषा) निंद्रा के आगोष में आये बिना सफलतापूर्वक पूर्ण किया एवं चाय और बिस्कुट का अल्पाहार लेकर दूसरे व्याख्यान के लिए बैठ गए। इस समय तक लोगों में आलस्य का स्थायित्व  आ चुका था, लेकिन इस व्याख्यान में सोना, शेर के मुख से निवाला निकालने जैसा था क्योंकि इस विषय के प्राध्यापक ने आरंभ में ही यह सांकेतिक चेतावनी दे दी थी कि उनके विषय में सफल होने की प्रायिकता लगभग शून्य है एवं उनके विषय में कोई लिखित परीक्षा भी नहीं होगी, केवल मौखिक परीक्षा के आधार पर अंक दिये जाएँगे। लोगों ने अपनी इंद्रियों पर काबू करने का निष्फल प्रयास किया, किन्तु आज का मानव अपने आप को व्हाट्सअप्प (WHATSAPP) जैसे सामाजिक एवं आवश्यक बुराई से कैसे दूर रख सकता है, अत: कुछ दोषियों को चेतावनी देकर छोड दिया गया । किसी तरह यह व्याख्यान समाप्त हुआ और लोगों ने बिना किसी चेतावनी संकेत की परवाह किए मेस में पंक्ति बना ली और दोपहर का भोजन ग्रहण करने के बाद सरदार पटेल सभागृह में एकत्रित होने लगे क्योंकि आज सबको यात्रा भत्ता की अग्रिम राशि मिलनी थी एवं भारत दर्शन के कार्यक्रम की सम्पूर्ण एवं अंतिम जानकारी भी मिलनी थी ।

Sorry, the coach cannot be attached in any train. We have to manage ourselves.” इन शब्दों के साथ वरिष्ठ प्राध्यापक (संघटनात्मक व्यवहार) ने अपना उद्बोधन प्रारम्भ किया । सभी परिवीक्षार्थी इस समाचार से सहम से गए थे क्योंकि सभी को वो दिन याद आने लगे थे, जब बिना कन्फ़र्म टिकट के यात्रा करने पर टीटी द्वारा अनादरित होते थे । किन्तु कुछ समय पश्चात हमें यह बताया गया की सभी के लिए कन्फ़र्म टिकट की व्यवस्था कर दी गयी है, लेकिन समस्या यह है की समूह के 98 सदस्यों को तीन रेलगाड़ियों  से पृथक-पृथक करके भेजा जाएगा । कुछ परिवीक्षार्थी इस समाधान से अत्यंत प्रसन्न हुये किन्तु कुछ के हृदय में ऐसा पहाड़ टूटा जैसे उनके मित्र की किसी अन्य ट्रेन में एक रात्रि की यात्रा से उनके व्यक्तिगत जीवन में कलह पैदा कर देगी । किसी तरह अन्य लोगों ने ऐसे चोली–दामन के साथ वाले मित्रों को ढाढ़स बधाया । हमे ट्रेक्किंग से संबन्धित सभी आवश्यक सामग्री की जानकारी पुनः करायी गयी एवं कम से कम सामान ले जाने की सलाह भी दी गयी । सभी परिवीक्षार्थिओं ने अपना थैला तैयार कर लिया और बचा-कुचा सामान जुटाने में लग गए ।

रात्रि में भोजन के उपरांत हम लोग स्टेशन की ओर रवाना होने के लिए छात्रावास के द्वार पर पँहुचे, बस में आरूढ़ होने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था और हमेशा की तरह बस परिवीक्षार्थिओं से ऐसे आच्छादित थी मानो यह बस किसी सिनेमा हाल की ओर जा रही हो । मेरी बस छूट चुकी थी और मेरे साथ दो अन्य परिवीक्षार्थी भी इस घटना के साक्षी थे । ऐसी अवस्था में हमने बिना समय बर्बाद किए तुरंत “JUGNOO AUTO” को बुलाया और शान से स्टेशन पहुंचे । हम लोग ट्रेन में आरूढ़ हुये और अपनी सीट पर पहुँच कर सामान को व्यवस्थित करके तुरंत ट्रेन में उपस्थित अपने साथियों से मिलने निकल पड़े जैसे हम सुबह की सैर पर निकले हों और पूरी ट्रेन हमारा मोहल्ला हो एवं हम उस मोहल्ले के नेता ।

30 अप्रैल , 2016 दिन शनिवार  

अगले दिन सुबह सभी की रेलगाडियाँ देश की राजधानी दिल्ली पहुँच चुकी थी और हमारी मनाली के लिए बस शाम को 4 बजे यमुना रेस्ट हाउस के सामने से मिलनी थी, अत: लोगों ने अपनी दैनिक क्रियाएँ सम्पन्न करने के पश्चात CONNAUGHT प्लेस का भ्रमण करने में समय का सदुपयोग किया और शाम को 4 बजे यमुना रेस्ट हाउस में उपस्थित हो गए, लेकिन बस का कोई अता-पता नहीं था । हमें आज पुनः आभास हुआ की हमारे यहाँ मानक समय मात्र एक परिकल्पना है जिसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है और हमारे यहाँ समयानुसार कोई भी घटना होना असंभव है, चाहे वह राजधानी एवं शताब्दी जैसी ट्रेनों का गन्तव्य पर पहुँचना ही क्यूँ न हो । कुछ ही समय में वहाँ NRTMA (Northern Railway Trekking and Mountaineering Association) के प्रतिनिधि आ गए और इस समय का उपयोग हमें NRTMA की टोपी एवं एक छोटा थैला देने में किया गया । अंततोगत्वा दो बसें 17:30 पर निर्धारित स्थान पर आई। समूह के पुनः दो भागों में पृथक होने का समय आ गया था, जहाँ एक ओर चोली – दामन के साथ वाले परिवीक्षार्थिओं को एक रात्रि का बिछड़ना भी स्वीकार्य नहीं था वहीं दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति भी थे जो अपनी बस में किसी नारी को नहीं बैठाना चाहते थे । अन्ततः सारे संभव क्रमचय एवं संचय के बाद लोगों ने अपनी अपनी जगह सुनिश्चित की और दोनों बसों ने 6:00 बजे शाम को मनाली के लिए प्रस्थान किया । चलने से पहले ही यह निर्धारित किया गया था कि रात्रि के भोजन के लिए बस को कहाँ रुकवाना है, रात्रि में लगभग 10:20 के आस-पास हम सुंदरनगर में किसी ढ़ाबे पर रुके और शालीनता का परिचय देते हुये 98 लोग कतार लगा चुके थे। स्थान सीमित था, व्यक्ति अधिक थे और कुछ तो सुबह से इस उम्मीद में भूखे थे कि रात्रि में असीमित भोजन से अपनी क्षुधा को शांत करेंगे । खैर किसी तरह सभी ने कुछ न कुछ खा के आगे कि यात्रा की शुरुआत की। रात्रि में दीप विषर्जन का समय भी हो गया था, अत: लोगों ने अपनी-अपनी अर्ध शायिका को आवश्यकतानुसार तिरछा किया और अपने अपने इष्ट देवता को याद करके सो गये ।

01 मई, 2016 दिन रविवार

अचानक से मुझे कुछ कंपन सा महसूस हुया, आँख खुली तो पता चला की मैं जिस बस में यात्रा कर रहा था उसमे कुछ तकनीकी खराबी आ गयी थी, अभी सुबह के 5:00 बजे थे । मुझे बी टेक प्रथम वर्ष में अध्ययन किए गये यांत्रिक अभियांत्रिकी के कुछ सिद्धान्त याद थे और शायद आज उपयुक्त समय भी था, लेकिन मेरे साथ इस देश के यांत्रिक अभियांत्रिकी में स्नातक व्यक्तियों की अग्रिम पंक्ति भी सफर कर रही थी, अत: मैंने किसी भी प्रकार का तकनीकी सुझाव देने से अपने आप को रोक लिया और यात्रा प्रतिनिधि के अग्रिम आदेश की प्रतीक्षा में बैठ गया । हमें आदेश प्राप्त हुआ की हम समाने के एक ढ़ाबे में बैठ जाएँ और दूसरी बस की प्रतीक्षा करें । कुछ ही समय उपरांत हमें दूसरी बस में बैठाया गया और हम पुनः अपने अधूरे स्वप्न को पूर्ण करने की कोशिश में सो गये ।  अभी सुबह के 8:00 बजे थे कि फिर से किसी ने जगा दिया, आँख खुली तो पता चला की हमारी बस मण्डी के किसी होटल के बाहर खड़ी है । अब लोगों की सुबह की दैनिक क्रियाओं का भी समय हो चुका था । कुछ लोगों को शायिका चाय उपलब्ध नहीं हुयी थी तो ऐसे लोगों को दैनिक क्रियाओं में अपेछित  सफलता नहीं मिली किन्तु कुछ लोगों ने जल की उचित मात्रा का सेवन करके दैनिक क्रियाओं में पूर्ण सफलता प्राप्त की। हम लोग जल्दी से आगे के सफर के लिए इस उम्मीद के साथ रवाना हुये की सुबह का नास्ता मनाली के होटल में करेंगे, किन्तु क्या पता था की नास्ते का सारा पैसा सिर्फ आधे लोग ही वसूल कर पाएंगे जो पहले ही मनाली पहुँच चुके  थे और अपने दिन के कार्यक्रम की रूपरेखा को अंतिम रूप दे रहे थे । अब दोपहर के लगभग 12:30 बजे थे और हमारी बस मनाली के प्राइवेट बस स्टैंड पहुँच चुकी थी ।  बस से उतरते ही वहाँ के अल्प तापमान का अनुभव हुआ, कुछ लोगों को सीघ्र भूख लगी थी तो कुछ पवित्र लोग बिना स्नान भोज्य पदार्थ को हाथ भी नहीं लगाना चाहते थे , वहीं कुछ के आभा– मण्डल से प्रतीत हो रहा था की इन्हें सुबह की दैनिक क्रिया में पूर्ण सफलता नहीं मिली है। हम पूर्व निर्धारित होटल में आए और हमें बताया गया की दोपहर का भोजन 01:30 पर मिलेगा । मुझे होटल का ROOM दो IRSEE परिवीक्षार्थिओं के साथ साझा करना था, हम लोग कक्ष में पहुंचे और अपने अपने सामान को यथा स्थान रख दिया । शायद दोनों IRSEE परिवीक्षार्थिओं ने मनाली घूमने की रूपरेखा पहले से ही बना रखी थी, इसलिए दोनों तुरंत COOL DUDE बन गये और अविलंब बाहर चले गये । अब मैं कक्ष में अकेला था , मैं स्नान करके भोजन के लिए निर्धारित स्थान पहुँच गया जहाँ गरमागरम भोजन हमारी राह देख रहा था, मैंने बिना देर किए अपनी थाली में आवश्यकतानुसार भोज्य पदार्थ रखा और जल्दी से अपने उदर की क्षुधा को शांत किया । हम सभी 14:30 पर पूर्व नियोजित स्थान पर एकत्रित हुये जहाँ NRTMA वालों ने हमें पुनः पर्वतारोहण से संबन्धित अतिआवश्यक वस्तुयों के बारे में बताया, जैसे – हाथ में पहनने के दस्ताने, अच्छे जूते, पराबैंगनी किरणों को परावर्तित करने वाला चश्मा , जुराबों के 2-3 सेट , ठंडक से बचने के लिए आवश्यक वस्त्र । हमें इन सभी आवश्यक वस्तुयों को एकत्रित करने के लिए अगले दिन के सुबह 08:00 बजे तक का समय दिया गया । जहाँ कुछ लोग सामान खरीदने के लिए मनाली की माल रोड़ स्थित बाज़ार की तरफ निकल गये वहीं कुछ लोग मनाली के आस –पास की जगह को देखने निकल पड़े । मैं भी बाज़ार से कुछ सामग्री क्रय करके 6:00 बजे तक वापस आ गया  और सो गया । रात्रि का भोजन 8:30 पर मिलना था इसलिए समय से 5 मिनट पहले हम भोजन लेने की पंक्ति में खड़े हो गए । जहाँ एक ओर दोपहर की भाँति स्वादिष्ट एवं लज़ीज़ शाकाहारी भोजन था वहीं दूसरी ओर शाम के भोजन में मांसाहार की भी व्यवस्था थी, कुछ लोग इस मौके और मौसम दोनों का फ़ायदा उठाते हुये अपनी चिर स्थायी भूख को शांत करने में लग गए । भोजन के पश्चात हम लोग अपने अपने कक्ष में आ गए , लेकिन मेरे कक्ष में आवंटित दो लोग अभी भी शायद मनाली की गलियों में कहीं घूम रहे थे और मुझे पता भी नहीं था कि उनके दैनिक कार्यक्रम की क्या रूपरेखा थी ? मैं कपाट की कुंडी लगा ही रहा था कि तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, मैंने कपाट खोले तो सामने वो दोनों खड़े थे और उनके आभा मण्डल को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे स्वर्ग का सफ़र पूर्ण करके आए हों । मैंने उनका स्वागत किया और उन्हे अगले दिन के कार्यक्रम की जानकारी दी, कुछ ही देर में उन्होने अपने थैले से नशीला द्रव (वियर)  निकाला और बालकनी में बैठ गए , मैं उनके जवानी के जोश के उफान को शांत नहीं करना चाहता था इसलिए मैंने शायिका पर समय बिताना उचित समझा ।

02  मई, 2016 दिन सोमवार

अभी सुबह के 6:00 बजे थे और शायिका से उठने का मन नहीं कर रहा था, किन्तु किसी तरह अपने अधूरे रात्रि स्वप्न का परित्याग करके उठना पड़ा और सुबह की शायिका-चाय 6:30 पर ग्रहण करने के पश्चात 8 बजे अल्पाहार के लिए निर्धारित स्थान पर पहुँच गये । अल्पाहार के बाद हमें 8:45 पर DHUNDI कैंप के लिए प्रस्थान करना था, अत: सभी अपना-अपना  सामान बाँध कर आगे की यात्रा के लिए कमर कस कर  वाहन का इंतज़ार कर रहे थे इस दौरान कुछ लोगों ने समय का पूर्ण उपयोग करते हुये अपनी अपनी SELFIE को मोबाइल में कैद कर लिया। कुछ समय पश्चात 4 छोटी बसें आयीं और सभी लोगों ने अपना अपना स्थान सुनिश्चित किया और हम आगे की यात्रा जोकि की लगभग 20  किमी के आस-पास थी, के लिए निकल पडे । कुछ ही पलों में हमारे कुछ साथियों ने बस के ध्वनि प्रणाली पर अपना कब्जा करके, मन चाहे नग्मों का सिलसिला शुरू कर दिया और हम मनाली की वादियों में खो से गये । शायद अभी 11:00 बजे थे और हमारी बस DHUNDI कैंप स्थल के समीप पहुँच चुकी थी, और लगभग 1 किमी का पैदल सफर तय करने के बाद हमें DHUNDI कैंप पहुँचना था । यहाँ पर हमें अनावश्यक सामान को यहीं पर रखने की सलाह दी गयी, सभी ने अपने-अपने सामान का कुछ अंश वहीं रख दिया और कुछ समय पश्चात हम आगे की ओर रवाना हुये । करीब 1 घंटे में हम “बकरथच” कैंप पहुँच गए जिसकी समुद्र तल ऊँचाई लगभग 11500 फीट थी, आज के दिन हमें यहीं रुकना था और अगले दिन प्रात:काल व्यास कुंड के लिए प्रस्थान करना था ।  “बकरथच” कैंप पहुँच कर सभी को टेंट एवं स्लीपिंग बैग आवंटित कर दिये गए, किसी टेंट में 3 लोग तो किसी में 6 लोगों ने अपना सामान रखा । कुछ समय पश्चात दोपहर के भोजन का समय हो गया था, इसलिए खाने के लिए पंक्ति का लगना स्वाभाविक था । खाने में सब्जी, दाल, चावल, रोटी सभी कुछ था एवं इस ऊँचाई पर इतने अच्छे और स्वादिष्ट भोजन को ग्रहण करने के बाद लोगों ने सोना पसंद किया, लेकिन कुछ लोग अभी प्रकृति की गोद में बैठकर पल-पल बदलते मौसम का आनंद लेने लगे । अभी दोपहर के करीब 3:30 बजे थे कि एक सीटी की आवाज़ सुनाई दी जो की इशारा कर रही थी कि शाम की चाय मिलने का समय हो गया है । सभी ने पंक्तिबद्ध होकर चाय एवं बिस्कुट ग्रहण किया और तत्पश्चात सभी एक स्थान पर एकत्रित हुये जहाँ सभी को पर्वतारोहण से संबन्धित मूलभूत बातों से अवगत कराया गया एवं कुछ समय बाद ACCLIMATIZATION WALK पर जाने का आदेश दिया गया । इस ACCLIMATISATION WALK का उद्देश्य हमें अगले दिन होने वाली यात्रा के प्रति अनुकूलित करना था । जहाँ बहुत से लोगों ने बड़े ही उत्साह के साथ इस WALK का मज़ा लिया, वहीं कुछ लोगों ने अपने यहाँ आने के निर्णय पर खेद भी व्यक्त किया। इस  ACCLIMATISATION WALK के दौरान हमने लगभग 2.5 किमी की पैदल यात्रा की और शाम को 6:30 बजे तक अपने कैंप स्थल पर आ पहुँचे । कुछ समय पश्चात पुनः सीटी की आवाज़ के साथ लोग सूप लेने के लिए पंक्ति में लग गए । इसी क्रम में रात्रि भोजन का भी कार्यक्रम था, इतनी  ऊँचाई पर विद्युत का कोई साधन नहीं था, अत: जल्दी भोजन ग्रहण करने के पश्चात दीप विसर्जन करना था । सभी ने भोजन ग्रहण किया, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती थी कि बिना हाथ में जल का स्पर्श किए थाली कैसे धुली जाये ? किसी तरह लोगों ने हिम्मत करके उस ठंडे-ठंडे जल से थाली धुली और अपने अपने टेंट में चले गये । कुछ रात्रिचर साथियों ने ताश के पत्ते खेलकर समय का सदुपयोग भी किया । अब समय था अपने आप को स्लीपिंग बैग के अंदर स्थापित करने का, जो कि अत्यंत कठिन सा प्रतीत हो रहा था लेकिन स्लीपिंग बैग ने मेरे अकेलेपन को सहारा दिया और मैं कुछ ही समय में उससे लिपटकर ऐसे सो गया जैसे बरसों से विछड़े नायक नायिका का मिलन हो गया हो ।

03  मई, 2016 दिन मंगलवार

आज एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक पर्वतारोहण यात्रा की शुरूआत होनी थी । जहाँ कुछ लोग सुबह 4:00 बजे से अपनी दैनिक क्रियाओं को सम्पन्न करने के सपने लेकर कैंप से निकल चुके थे वहीं कुछ लोग अभी अपने स्वप्न में ही खोये हुये थे। आखिर 6:30 तक सभी लोग चाय लेने के लिए पंक्ति में लग चुके थे । कुछ लोगों ने अपनी दैनिक क्रियायों को चाय गृहण करने के बाद पूर्ण करने में सफलता पायी, तो कुछ लोगों के उदर में कई अवांछनीय उपापचय क्रियायों ने जन्म ले लिया था जिनसे छुटकारा पाना बहुत कठिन सा प्रतीत हो रहा था । 7:30 पर अल्पाहार ग्रहण करने के पश्चात हम 8:15 पर पर्वतारोहण के लिए निकले, निकलते समय हमें मार्ग के लिए बिस्कुट, चॉकलेट, MANGO FROOTI जैसे खाद्य पदार्थ भी दे दिये गए । सभी लोग ऊर्जा से आप्लावित थे और एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुये एक कतार में लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे ।  कुछ लोग एक समान गति से चल रहे थे तो किसी की चाल समय के साथ मंद हो रही थी । कुछ लोग मार्ग में मिल रही बर्फ से खेल रहे थे तो कुछ लोग अधिक से अधिक चित्र की चाह में बार बार नयी भाव भंगिमा में नज़र आ रहे थे । आज हमें लगभग 2000 फीट की ऊंचाई तक पहुँचना था जहाँ से व्यास नदी का उद्गम हो रहा था । आज की यात्रा कठिन थी क्योंकि आज हमें अधिकतम पैदल यात्रा बर्फ के ऊपर चलकर पूरी करनी थी । लोगों में उत्साह की कमी नहीं थी, सभी एक पंक्ति में आगे बढ़ रहे थे एवं SELFIE का भूत अभी भी कई लोगों के सर चढ़ के बोल रहा था । लगभग 3 किमी की यात्रा के पश्चात अब हमें एक ऊँचे पर्वत की चोटी पर चढ़ना था, यह अत्यंत कठिन सा प्रतीत हो रहा था किन्तु आत्मविश्वास से परिपूर्ण साथियों के साथ मैं 3-4 अल्पविराम में इस पहाड़ के शीर्ष पर पहुँच गया । अभी भी हमारी मंज़िल लगभग 0.5 किमी दूर थी लेकिन इसके आगे का सफ़र कुछ ज्यादा ही कठिन था क्योंकि अब हिम से पूरी तरह आच्छादित ग्लेशियर हमारे कदमों के नीचे था और 96 व्यक्तियों का समूह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था । कुछ ही देर में हम अपनी मंज़िल पर पहुँच चुके थे और लोगों ने जल्दी-जल्दी इस पल को अपने कैमरे में कैद किया और इतनी ऊँचाई पर बैठकर मौसम का आनंद लेने लगे । इस समय तक मौसम बहुत खराब हो चुका था और बारिश किसी भी समय हो सकती थी, इसलिए हमें जल्दी से प्रस्थान करने का आदेश प्राप्त हुआ । पहले बने पद चिन्ह अब तक बहुत फिसलन भरे हो चुके थे, उनका अनुशरण करना हानिकारक हो सकता था इसलिए उसके आसपास के क्षेत्र से होते हुये सभी लोग वापस लौटने लगे । कुछ लोग इस समय तक बहुत थक चुके थे और पीड़ा से कराह रहे थे लेकिन उनके पास चलने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था । कई लोगों ने पैदल चलने की बजाय बर्फ पर फिसलकर कुछ मार्ग पूरा किया, हालांकि यह सही विकल्प नहीं था क्योंकि पश्च भाग से ऊष्मा का स्थानांतरण उनके स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं था ।  जैसे–जैसे लोग तम्बू के करीब पहुँच रहे थे, मन में आत्म विश्वास बढ़ रहा था और मुख मंडल पर खुशी के भाव भी । पता नहीं किस जगह पर मेरा एक पग गलत तरीके से पड़ा और मेरे एक पैर में कुछ तकनीकी खराबी आ गयी और मैं दर्द से कराह रहा था, मैं अपनी पीड़ा लिए अपने तम्बू की तरफ बढ़ रहा था और 3-4 विराम के पश्चात अपने कैंप में पहुँच गया जहाँ दोपहर का भोजन सभी का इंतज़ार कर रहा था । सभी ने जल्दी-जल्दी भोजन ग्रहण किया और अपने–अपने तम्बुओं में जाके आराम करने लगे । कुछ समय पश्चात बारिश भी प्रारम्भ हो गयी और मेरी आँख कब लग लगी, शायद मैं बहुत थक गया था इसलिए पता भी नहीं चला । टेंट के बाहर सीटी की आवाज सुनायी दी, बाहर निकल कर देखा तो सूर्य देव पहाड़ों के पीछे से उस दिन के अंतिम दर्शन दे रहे थे । हमने SOUP लेने की पंक्ति में अपना स्थान बनाया और हम सूप का आनंद ले ही रहे थे की बारिश भी प्रारम्भ हो गयी । किसी तरह बारिश की ठंडी-ठंडी बूंदों से बचते बचाते हमने रात्रि भोज को अपने उदर में स्थापित किया और तेजी से अपने तंबू में आ गए । अभी शाम के 7:30 बजे थे और नींद न आना स्वाभाविक था, अत: मेरे साथियों ने ताश के पत्ते खेलने का आग्रह किया । मुझे ताश की ABCD ही आती थी, लेकिन आज अपने ज्ञान को बढ़ाने का मौका भी था और समय भी । करीब 2-3 घंटे ताश खेलने के बाद हमने अपने अपने स्लीपिंग बैग में अपने आप को यथासंभव स्थापित किया और पर्वतारोहण की अपनी यात्रा के पलों को याद करते करते कब आँख लग गयी, पता भी नहीं चला ।

04  मई, 2016 दिन बुधवार

आज सूरज कुछ ज्यादा ही चमकीला प्रतीत हो रहा था, हाँ पर उन कुछ लोगों के लिए जो कल व्यास कुंड पर किसी तरह पहुँच कर अपने आप को भाग्यशाली समझ रहे थे, वहीं दूसरी ओर अधिकतर लोगों के लिए यात्रा का यह अंतिम पड़ाव मिला जुला था । आज सुबह उठने की जल्दी नहीं थी क्योंकि DHUNDI कैंप तक का सफर बहुत छोटा था । सब ने सुबह उठकर सारी शंकाओं के निराकरण के पश्चात जलपान किया और यह जानते हुये भी कि अब वापसी का सफर बिना खतरे, बिना हिम और बिना सूरज की पराबैंगनी किरणों वाला है, लोगों ने विभिन्न प्रकार की महंगी क्रीम का लेप करके और आँखों पर काला चश्मा चढ़ा के आगे चलना शुरू किया । कुछ एक स्वाभाविक रूप से कमजोर दिखने या दिखाने वालों के लिए ये पहाड़ों की उतरन भी जटिल प्रतीत हो रही थी । जैसे तैसे सभी लोग नीचे स्थित DHUNDI कैंप पर पहुँच गए । पहुँचते ही वर्षा का आरंभ होना और अगली पारी के मित्रों का मिलना जैसा 1942 के “रिमझिम रिमझिम रुमझुम रुमझुम” का अहसास करा गया और अगली पारी के सदस्यों को यात्रा से जुड़ी बातों का बोध कराया गया  । आगे कैंप पर दिये गए तंबुओ का स्व-आवंटन प्रारंभ हुआ और सबने इसमें तत्परता दिखाते हुये अपनी सुविधानुसार अधिक ऑक्सीजन वाले तम्बू हथियाए । DHUNDI कैंप, समस्त नहीं तो बहुतायत सुविधायों से युक्त एक आधुनिक कैंप था जिसको देखते ही बकरथच कैंप की सारी चुनौतियाँ याद आ जाती थीं । पर अभी जनसमूह का हर्षोल्लास देखने लायक था जिसमें दोपहर के भोजन ने चार चाँद लगा दिये । चार दिनों बाद पर्वत पर ऐसा भोजन जिसमें  अचार एवं सलाद भी हो तो खुशी के आँसू स्वाभाविक थे । भोजन  समाप्त करने के बाद सबने मोबाइल (दूरध्वनी यंत्र) टटोले और सिग्नल की एक खूँटी दिखते ही खुद को 25-26 मित्रों के साथ फीलिंग एक्साइटेड की ख़बर FACEBOOK पर प्रसारित कर दी और अवांछनीय LIKES की राह में बैठ गए । दिन की आखिरी चुनौती नदी पार करने की थी जिसको सुरक्षा उपकरणों के साथ पार करना था । खैर 13000 फीट ऊँचाई चढ़ चुके लोगों के लिए यह मात्र एक खेल था जिसे सबने हँसते हँसते पूर्ण किया । शाम होते ही समूह के कुछ चंचल साथियों ने, जो भली भाँति यह जानते थे कि आज कैंप की अंतिम रात्रि होगी, कुछ अनूठे माध्यम से ऐसी अंताछरी खेली जिसमें एक ही गाने को तोड़ मरोड़ के विविध रूपों में प्रस्तुत किया । आज अगर आर डी बर्मन होते तो शायद अपनी आत्महत्या कर लेते । जैसे-तैसे उत्तेजित साथियों पर शीतल जल ड़ालकर उनके अंदर की अग्नि को प्रज्वलित होने से रोका गया । रात में वर्षा के कारण ठंड बढ़ चुकी थी पर बकरथच जैसी भी नहीं थी जिसने WATERPROOF स्लीपिंग बैग की अवधारणा को भी गलत सिद्ध कर दिया था । इस प्रकार एक और दिन कुशलता पूर्वक व्यतीत हो गया ।

05  मई, 2016 दिन गुरुवार

 

सुबह 4 बजे ही आँख खुल गयी और मैं अनायास ही अपने स्लीपिंग बैग में पड़ा पड़ा इंतज़ार करने लगा की कब थोड़ा सा प्रकाश हो और मैं अपनी दैनिक क्रियाओं को सम्पन्न करूँ क्यूंकी आज हम 95 लोगों के पास केवल दो अस्थाई टॉयलेट थे और समय के साथ टॉयलेट में पहले जाने की प्रतिस्पर्धा बढ़ना भी स्वाभाविक था । किसी तरह सुबह के 4:30 बजे और मैं अपने टेंट से बाहर निकला, चारो ओर अंधेरा देख कर मन भयभीत हो गया जैसे बचपन में पढ़ी एवं सुनी गयी कहानियों के सच होने का समय आ गया था । कुछ समय पश्चात मानव जाति के दर्शन हुये और मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और इस आत्मविश्वास का फायदा उठाते हुये मैंने अपनी दैनिक क्रियाएँ 5:15 तक सम्पन्न कर ली और टेंट के बाहर ही बैठ कर ठंडी ठंडी पवन का आनंद लेने लगा ।

सुबह 6:30 पर चाय मिली और 8:30 पर अल्पाहार ग्रहण करके हम लोगों ने अपना बैग बांधा और आगे की पैदल यात्रा के लिए तैयार हो गए। हम करीब 09:00 बजे उन वादियों को अलविदा कह कर वहाँ से सोलांग वैली के लिए निकले । अब हमें लगभग 6.5 किमी का सफर पैदल तय करना था ।  सभी लोग उत्साह के साथ एक पंक्ति में आगे बढ़ रहे थे, जहाँ मार्ग में कुछ लोग समय निकाल कर प्रकृति की गोद में SELFIE का आनंद भी ले रहे थे वहीं कुछ लोग अपनी यात्रा के अनुभव अपने सफर के साथियों के साथ बाँट रहे थे। क़रीब 11:00 बजे तक हम सभी सोलांग वैली पहुँच चुके थे और दिन के प्रधान भोजन का इंतज़ार करने लगे । कुछ ही समय में भोजन तैयार हो गया और सभी भोजन ग्रहण करने के पश्चात वापस लौटने के लिए बस की राह देखने लगे ।  कुछ ही समय के उपरांत सभी ने ट्रेवेलर में अपनी अपनी जगह सुनिश्चित की और मनाली के लिए प्रस्थान किया । मनाली से दिल्ली के लिए हमारी बस शाम को 4:00 बजे थी, इसलिए लगभग 3:30 घंटे का बहुमूल्य समय हमें मनाली की माल रोड़ में सैर करने के लिए दिया गया । हालाँकि दोपहर का समय था, लेकिन मनाली का मौसम बहुत सुहावना हो रहा था, पूरी माल रोड़ सैलानियों से भरी पड़ी थी, नव विवाहित दम्पतियों का भी हुजूम चरम पर था । जहाँ एक ओर कुछ साथी कपड़े खरीद रहे थे वहीं कुछ अपने विवाह के उपरांत मनाली आने की योजना पर काम कर रहे थे । हमने भी लोकल फूड का आनंद लिया और पास ही स्थित बौद्ध MONASTERY में कुछ समय बिताया । चार बजे तक सभी लोग प्राइवेट बस स्टैंड पहुँच चुके थे जहाँ से सभी को दिल्ली की बस में आरूढ़ होना था  । अब प्रश्न यह था की कौन किस बस का चयन करेगा और किस बस में फ़ैकल्टी एवं नारियाँ जाएँगी ? एक ओर कुछ साथियों में परस्पर दोस्ती अत्यंत प्रगाढ़ हो चुकी थी, वहीं कुछ लोगों में परस्पर रोष भी व्याप्त था। अन्ततः सारे संभव क्रमचय एवं संचय के बाद लोगों ने अपनी अपनी जगह सुनिश्चित की और दोनों बसों ने 4:30 बजे शाम को दिल्ली के लिए प्रस्थान किया । अभी हमने लगभग 1 घण्टे का सफर ही तय किया था कि दूसरे बस के मार्ग में खराब होने की सूचना हमारे यात्रा प्रतिनिधि के पास आयी, अब मैं मन ही मन ईश्वर को इस बात का धन्यवाद दे रहा था कि उसने मुझे समय पर सद्बुद्धि दी और मैंने इस बस में आरूढ़ होने का निर्णय लिया । जहाँ एक ओर बस बहुत तीव्र गति से अपना मार्ग तय कर रही थी वहीं दूसरी ओर कुछ लोग निंद्रा के आगोष में आ चुके थे और कुछ लोग बस में लगे ELECTRONIC यन्त्र में चलचित्र का आनंद ले रहे थे । मैंने भी अपने नयनों को कुछ आराम प्रदान करने की कोशिश की लेकिन अग्रिम सीट पर स्थापित होने के कारण, सोने में सफलता नहीं मिली । अभी रात्रि के लगभग 9:00 बजे थे, बाहर बारिश भी हो रही थी, अचानक बस एक ढाबे पर रुकी । बाहर देखा तो पता चला कि यह वही सुनियोजित स्थान था जहाँ हमें रात्रि का भोजन ग्रहण करना था ।  हमारी दूसरी बस को आने में समय था, अत: सभी दूसरी बस का इंतज़ार किए बिना भोजन लेने की पंक्ति में लग गए । हालाँकि भोजन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था लेकिन शायद मौसम ने उसे बेस्वाद कर दिया था, किसी तरह लोगों ने अल्पतम एवं आवश्यक मात्रा में भोज्य पदार्थ ग्रहण किया और हमारे यात्रा प्रतिनिधि को भोजन से संबन्धित शिकायतें  देने लगे, हमारा यात्रा प्रतिनिधि बहुत ही सज्जन प्रकृति का था इसलिए उसने बड़े ही सहज भाव से मामले को संभाला और हम आगे की यात्रा के लिए बस में बैठ गए । भोजन ग्रहण करने के बाद जहाँ एक ओर बस की रफ्तार और भी तेज़ हो गयी थी वहीं लोग धीरे-धीरे निंद्रा के आगोष में जाते दिखाई दे रहे थे । मेरी भी कब आँख लग गयी, पता नहीं चला ।

06  मई, 2016 दिन शुक्रवार

सुबह 6:00 बजे अचानक से आँख खुली तो देखा बस एक मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़ी थी और सभी लोग जल्दी-जल्दी नीचे उतर रहे थे । मैंने भी अपने स्वप्न को बीच में ही त्याग दिया और सारे सामान को एकत्रित करते हुये बस को अलविदा कह दिया । यहाँ से लोगों ने अपने-अपने गंतव्य के अनुसार दिल्ली मेट्रो की सेवाओं का उपयोग किया और निर्धारित स्थान पर पहुँच गए । कुछ लोगों को दिल्ली में रुकना था तो कुछ अपने घर जाना चाहते थे, कुछ दिल्ली घूमना चाहते थे तो कुछ को अगली ट्रेन से वडोदरा के लिए रवाना होना था । अत : लोगों ने अपने अपने विकल्प चुन लिए और इस प्रकार हमारी इस यात्रा का अन्त हुआ ।

                                               

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( सौरभ सिंह, भारतीय रेल इंजीनियरिंग  सेवा – 2013 परिवीक्षार्थी )

Saurabh Singh
IRSE-2013

Calling on The President of India


One of the exciting things which take place at the end of probation is ‘Visit to the President of India’. It is officially called as ‘Calling on the President of India”. All the Group A services officers are appointed by the President and work under his pleasure. Although , President has delegated this responsibilities to various ministries but ceremonially he is our appointing authority. So, almost all the ministries let their probationers call on the President of India before they actually start their working. No doubt, we all wait for this moment, for the photographs and for the ‘likes’.

Visit to Rashtrapati Bhawan is conducted very formally. All the probationers are taken at once, you can’t enter there own your own. Moreover , the security is so high that you will not be allowed individual entry. Timings are specified and everything proceeds as per the plan. If you miss your group , you may have very hard time reaching there.

Darbar Hall is  place where The President meets the probationers. In-fact, all major ceremonies are done here. We reach half-hour before the arrival of president in Darbar Hall. There , we go through mock exercises for group photograph. The security officers of Rashtrapati Bhawan brief us about protocols for various activities.

Who will speak what is already decided and those who have to speak practice a lot to make it flawless. Generally, One probationer from every service gives 2 minute speech about the training which has been imparted in the service, on behalf of his batch.

The sequence of activities after the arrival of President is as follows:

  • Opening speech by Member of Railway Board/Head of Ministry.
  • Probationers share their experience of training.
  • Address by the President of India.
  • Closure speech by Member of Railway Board/Head of Ministry.
  • Then we go for group Photograph.

 

After photo session ,we proceed towards Banquet Hall for refreshments. Even the samosa of Rashtrapati Bhawan tastes good. We exit the Durbar Hall and take lots of photograph for Facebook.

The profile pics may change later but memories will remain forever.

The President said that the Engineering Service would provide the officers an opportunity to serve the society and they would be entrusted with tremendous opportunities at a young age. They should give back to society as the society had invested in them. Besides, they should remember Mahatma Gandhi’s talisman of thinking of the welfare of the poorest of the poor in order to arrive at correct decisions. If they consider their job as a mission, they would be able to have maximum job satisfaction.

CES(Roads)-2013
CES(Roads)-2013

 

IRSME-2013
IRSE-2013
View of Darbar Hall

 

A group of probationers of Indian Railway Service of Engineers, Indian Railway Service of Mechanical Engineers and Railway Protection Force called on the President of India, Shri Pranab Mukherjee today (May 17, 2016) at Rashtrapati Bhavan.
Speaking on the occasion, the President said that the Indian Railways is not only one of the largest rail networks in the world but one of those which are well managed. With 66,000 Km of route length, the track network of the Indian railways stretches to almost every nook and corner of the country. It carries 23 million passengers daily. He stated that Indian Railways has a deeper meaning than being a mere transportation system. It integrates far-flung areas of the country. Like the Indian Post Office, it is one of the few organizations in the country which have a truly national character having influence over the whole country. In undertaking journeys the individual identities of the people who are travelling are replaced by the fact that they all are passengers.
The President said that the Indian Railways is not just a commercial organization. It has also extended help and support to the needy when required. It has carried on the tremendous responsibility of economic development of the country. However, Indian Railways is also faced with manifold challenges which include ensuring safety, security and the punctual running of trains.
The President urged the probationers to always remember that through the services they were not merely earning their livelihood but were making a meaningful contribution to this great nation to which they belong. He said that they were getting a tremendous opportunity of serving the country. They must always show ingenuity, innovation and initiative while discharging their duties.

 

Thanks

One Year at Indian Railways


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At IRICEN, Faculty and Probationers

Recently, IRSE 2013 batch completed one year of service in Indian Railways. One year in any organization is not long enough to understand the intricate details of the system. Not many among us can say that we now know everything about Railways,at best we have only got the opportunity to look through the widow into this huge organization. Whatever we have know in last year has overwhelmed us in its complexity and magnificence.

Last one year has been filled with many eventful moments in the journey of life as well as the train. As a passenger, we may not appreciate the the work that Railways do. Its primary role is of transporting people from their place of origin to their place of destination safely. This business of transportation may seem to be devoid of any essence and work satisfaction. Let me tell you that opposite is the case here. Indian Railways is a world in itself with its different organizations as the family members. Railway board sits at the apex of family tree, controlling everyone in most of the aspects of their working. Various zones are like cousins, some big ,some small. General Manager is the paternal figure of the Zone. Similarly, Divisional Railway Manager is the apex authority at division. The basic functional unit of working is division. It is from here that operation starts and goes upto Railway Board. For you to travel in train, it takes effort of thousand of people to complete you journey, from origin to destination.

Importance of railways shouldn’t be looked only form point of view of a commercial transporter. I think it would be fair to say that Airports doesn’t represent the majority of us, it is the railway station which is the microcosm of India. At railway stations we are witness to every aspect of life, from birth to death, the railway stations of India forms an integral part of average Indian. Railways stations are lodging places for homeless, railways tracks are infamous for open defecation and suicide. It is hard to accept this fact that so much of engineering is tarnished by the insensible acts of people. But this doesn’t represent failure of railways, it is our collective failure that after 68 years of freedom, poverty and illiteracy, malnutrition and mortality, absence of hygiene and drinking water is persistent reality and you come to know this only when you travel  in Indian Railways.

Sometimes rail journey should be undertaken to feel the discomfort of masses.In last one year, we have traveled in every part of train, from engine to guard vain. When you make a transition from AC 1 to unreserved , you see  classic example of class difference. In AC 1 politicians travel , who represent the masses travelling in unreserved coaches. I am not saying that there should be no AC 1 but there should not be any unreserved coaches where people are stuffed like animals.

I strongly believe that development of Railways is the parameter of growth for National Economy. When you go to a railway station and don’t find any change, it is for granted that there has been no significant change in lives of average Indian. Until, the distressed faces of rural workers replaces well fed and well dressed people boarding the train , take it for granted that there has been no ‘Acche Din’. Until the passenger travelling on the floor of coaches get confirm seats, there has been no ‘Acche Din’. Until TTE treat you with respect, there has been no ‘Acche Din’.

As a probationer, we had the opportunity to travel the length and breath of this great country, we can proudly say that Indian Railways truly call itself the ‘Lifeline of Nation’. It takes the workforce of around 12 lakhs to keep this life line functioning, day and night. It is necessary for the government of the day to infuse some vitality in this lifeline.

Railways should be seen as more than a transporter,it the collective heritage of our national identity persisting through best and worst of times.

Thanks
 

 

 

 

Working for Railaways in Naxal Zone


One of the vehicles given to use for visiting the sites
One of the vehicles given to use for visiting the sites

Probationers in Indian Railway get unique opportunity to traverse length and breath of this country. I think no other service gives this much exposure in travelling as the Indian Railways. In other services, probationers are taken on ‘Bharat Dharshan’ but we are literally on Bharat Dharshan at any given moment of time.

I have recently been to some naxal affected areas of Jharkhand as a part of my field training.  In field training , probationers are sent to actual construction sites of Railways. It is quite obvious that construction activities take place in far off areas from the cities. Those areas where railway has not reached have been left behind in the developmental process.

Construction unit in field is headed by Deputy Chief Engineer who is a JAG grade officer. He works under Chief Engineer who sits at headquarter. Under Dy. CE there are many Inspector of works, assistant executive engineers and executive engineers for carrying out the work. This whole organisation is separate from open-line setup. Separate offices, resthouses and other infrastructure is developed for construction organisation. The head of construction organisation in a zone is Chief Administrative Officer who reports to General Manager.

Government of India’s policy is to counter naxal and maoist narrative with the prospect of development of the state. Development is really the effective antidote for any kind of extremism and insurgency. In this respect , Railways is seen as the major force behind any kind of growth story. There are  many Railway projects going on in Jharkhand. I have to Hazaribagh-Ranchi site. As you move away from Hazaribagh towards Chatra forest range, the threat perception of naxals increases significantly. It is not like you will always encounter naxals in these areas, but all the contractor and govt. officials work in their shadow. As of late, contractor is more harrased than govt officers. Basically he has to pay levy to them for working in their areas. Sometimes vehicles are burnt, sometimes labors are threatened , basically an atmosphere of fear prevails which is not healthy for developmental process.

Given all the circumstances, Government has to work through its agencies , one of which is Railways. We represent the will of the state and in doing so we have to exert our authority on behalf of Government of India. We have to construct new line inspite of all the challenges which lies before us. So the first thing is to motivate yourself and your subordinates for working on the project because such kind of post are considered as punishment posting. Once you have made your mind then only you can move forward. So the first hurdle is you prepare yourself. Infact in civil services, the exposure is more while in railways the contact is limited. So they face greater risk in working in these areas. You must have heard of DM’s being kidnapped or the attack on police convoy. For the Railways threat is not only to officers but also to thousands of passengers who are travelling on these routes.

The essence of public service is developing the most backward areas of our country. People write lofty answers in the examination but the real test lies here. It should not be said that officers alone can bring about change. Primarily it is the responsibility of politicians to be harbinger of change. It is they who make the policies and we implement it. So a backward state ruled by good politicians should be the idea place for true civil servant. Similarly a backward state ruled by corrupt politicians is the most unsuitable place to work. Sometimes, this works as feedback loop in which poor people are main victims. All the politics in our country is played in the name of poor but he always remains poor. Officers play a very small part, their main role is the effective implementation of task given to then by their political masters. In IES, there can’t be much interference because nature of job is technical and it can’t be left to discretion of anyone.

My personal experience from this tour was quite positive. In these areas , there is natural beauty tarnished only by the acts of men. We went to different construction sites:

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Apart from extremist challenge , there are engineering challenges which is our main work here.

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We also went to that site where naxals had burned contractor’s vehicle. In the name of ideology, this has become an extortion business and our pseudo-intellectuals posing as champion of human rights should come down to see what is being done in name of ideology. There is a severe need of pushing for growth in terms of infrastructure development in these areas. It only through these means that government can counter the narrative of left wing extremism.

We reached here when it was almost dark
We reached here when it was almost dark, Threat perception is greater here.

 

Mud houses of tribals
Mud houses of tribal settlers 

We stayed in Guest houses at different places. This is one big advantage with railways that we never have to think about travelling and staying in any part of country. Our seniors always take care of us. They make sure that we face no problem whatsoever.

Overall this was an enlightening experience which definitely enriched our perspective of this great nation. In probation there is an opportunity to experience in real what you have studied in theory. It gives you a glimpse of your career ahead. The diversity of work and the challenges ahead are put before us in detail. Also, the probationary period gives us unique opportunity to look into the actual working of government organization without having to bear any kind of responsibility.

Thank you

 

A visit to The President of India


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On Sunday morning, phone rang up with good news. Our special coach from pune to delhi had been confirmed. Everyone had a sigh of relief especially the family guys having their spouse travelling with them.

It was around 4 am and we found ourselves half waking-half dreaming on the platform waiting for the arrival of Goa express. As soon as the extra coach was attached, we hopped on. Of course the family guys were given preference in selecting their berths which they used generously.

In such a long journey, there are few activities that one can resort to. To name a few, one could sleep his way throughout the journey which is my favourite. Another is bakaiti which had its own delights. Take a random topic, consider yourself master in that, curse a few well known people and voila!, you are a bakait in no time. Playing cards is prominent among all. The uncertainty of game resembles life in a way. It was a good time to settle the account of coats. Of course, you can complete the long forgotten novel, but this most of time remains an idea till you get to your seat.

The day was hot as hell. It’s a lousy room in a lousy part of a lousy town. Only that it wasn’t a lousy part of Delhi. State entry road, runs parallel to Chelmsford’s road had taken us there. Yamuna rest house is near to NDLS. The CRB was to address probationers in the afternoon. Besides IRSE, probationers from IRTS, IRAS, IRPS, IRSS and RPF had gathered there. The small rooms of rest house seemed even smaller with one washroom being shared by 6, 7 peoples!! We managed somehow by thumping doors of washrooms occasionally.

CRB’s address was as dry as the month of may. Food was good and it really took away the frowns from faces. By evening, mob scattered and took abode to various places. Some went to rest houses at Yamuna, Lajpat Nagar and Luteyn’s bridge. Some retired to Ber sarai, Katwariya sarai to their chaps who were still perspiring there to get a taste of success.

And the fortunate day came, the next day 06 May 2015, when girls were busy in straightening the plates of there ivory white saries and boys in adjusting each other’s tie-knots. Bus was waiting outside yamuna rest house.

Crossing the Rajpath, One could see the famous Dome of Viceroy’s House through the uphill road at raisina hills, flanked by secretariat building on both sides. It was nearly 12 o’clock, sun was brightly lit over the wide roads of New Delhi. Vehicles looked dancing over the roads radiating heat. Bus took right from the Dalhousie’s road and we entered a highly secured area.

The front or the east gate of Rashtrapati bhawan has a large courtyard. There stands a peculiar column ( called jaipur column) having a lotus on the top. The lotus sprouts a star.

At the base these words were inscribed…

“In thought faith

In word wisdom

In deed courage

In life service

So may India be great”

On the right, A Gulmohor tree was blooming. Red at the top with green underneath. Guards were standing in front under a small shade made of sandstone. They invariably resembled the gulmohor with their red turbans and dark green uniform. Infact, everything was of sandstone in red and yellow. Thick walls, Oversized Pillers, Cannons depicted administration and authority.

We waited for our turn to step out of the bus. The grand staircases protected by 12 giant columns received us. Durbar hall is right under the great dome. Instead of expressing luxury, It reflected austerity. The statue of Buddha in abhay mudra was situated at one end of hall looking over the throne. It was all around draped by maroon velvet drapes which gave the setting a sense of royalty. A large chandelier was suspended in the center.

We waited there for a while. Staff introduced us with our surroundings. The Durbar hall was the same place where transfer of power took place, the annals of freedom were written, the shackles of slumber were broken.

At last the Honorable President of India arrived, Dressed in impeccable black buttoned up suit, with the golden chain of his pocket watch visible. Before he came all sort of rehearsal of photography session was done. Staff was diligent, how to address him (not his majesty, but Honorable President), checked the speeches, about who had to receive and how one receive him.

Two of the probationers shared there training experiences, some facts and aspirations. During training we traveled to the corners of country, met with people of different races and culture, watched sun going down to the depth of ocean and rise again from the heights of mountains, observed peacefully the faith of devotees bathing in holy rivers, the thunder of oceans at Kanyakumari and silence in the deserts of Rajasthan. For this and all, we were indebted to railways.

The president shared his words of wisdom with us. Although, the thing with wise words is, they are easily forgotten. Let me recollect some of them.

He stated that the scope, exposure, and responsibility that career in government offer, that too at a very young age is rare. The 162 year old railway is one of the oldest railway systems in the world. Railway finances have exponentially grown from Rs. 183 crores in 1947 to Rs. 1.59 lakh crores  in 2014-15. It is the virtual lifeline of the nation and has also now joined the select club of 1 billion tonnes plus freight loading Railways.

We should serve the people of the nation by putting in their best efforts. He called upon us to uphold the high standards and dignity which has been maintained over the years.

After the photography session was over, we had tee and snacks in the banquet hall. It was long room having golden curtains against the background of brown wooden walls with the portraits of previous presidents.  It had a long long table in the middle.

Then the crowd dispersed and there began another photography session.  Everyone was crazy in clicking and saving the moment. At the great stairs, in the forecourt, by the column, cameras and probationers were everywhere.

Inspite of a piercing sun overhead, the joy couldn’t be refrained. On the right, A Gulmohor tree was smiling. Red at the top with green underneath….

IRSE 2012
IRSE 2012

Northeast Frontier Railway- A challenge and an Opportunity


9 IRSE probationers were asked to go NFR for construction training. I was one of them.As the duration of training nears completion, its time to look back.

Most of us are concerned about our place of posting after joining the services.Since engineering services is a central service,you have an all-India liability to work in any part of country.An aspirants who prepares for this exam thinks only about positive aspects but there are some difficulties as well. Life is not a bed of roses even after clearing this exam. The more responsibilities you take , more will be challenges. Those who willingly want to work in Noth-east are still in minority whether in Railway or CPWD.In this regard ,i am giving you a glimpse of working in North-East Frontier railway from my point of view.

An opportunity
An average Indian is ignorant about N-E until  he prepares for some competitive examination. Only few of you can recall all the states of N-E along with their capital. If you think that capital of Assam is Guwahati then you need to improve you general awareness. This forces us to do some introspection that why N-E has not been fully integrated in our minds although it is an integral part of India an any other state.The reasons for this can broadly be put into geographical and historical context.
Due to historical reasons, North-east has virtually been cut-off from rest of India. Even though Bangladesh is more friendlier than Erstwhile East Pakistan the prospect of international corridor through it has still not been finalized. At the ‘neck’ the width is strip of Indian territory is just 40km. All the rail and road traffic going to north-east is diverted through this strip only. If this strip is somehow blocked, then whole of North-east is out of bounds. The only mode of communication left would be air transport.As large scale movements of goods and people can’t take place without the surface transport ,the N-E would be left on its own fate. However, even if that situation is very improbable, the significance of surface transport can’t be denied in integration of a country.

After you enter Assam,all the work is still ahead of you. How to connect even the remotest part of N-E via road and surface transport. Geographic features of N-E are uneven , hills interspersed with plains. The mighty Brahmaputra presents no less challenge, where all engineering is put to test. Britishers built bridges everywhere, except on Brahmaputra. As you are well aware that  Arunachal lies north of this river, the necessity of rail and road link to Arunachal becomes even more pertinent. Geopolitics of China with respect to Arunachal has put stakes very high for infrastructure projects. Actually, Indian Government have been jolted out of their slumber by the recent advances made by China in Tibet. China has completed its rail project along border areas even in worse conditions than ours.  The Chinese have completed projects in a time-bound manner, Indian ones have gone off-track once too frequently. At Dibrugarh, a rail cum road bridge is being constructed over brahmaputra to connect Arunachal Pradesh with Assam. This is strategic location for national security and development of Arunachal. The picture below speaks for itself, once completed we will be able to roll tanks on the bridge. This bridge is completely welded, first of its kind in India.

Rail cum Road Bridge,Bogibeel,Dibrugarh
Rail cum Road Bridge in Background,Bogibeel,Dibrugarh

Incredible India campaign about N-E says ‘Beauty unexplored’ but how would you do so if there are no proper connectivity links. Narendra Modi , in his election rallies promised a new beginning for N-E people and the result is showing. All construction project of railways have been given the status of ‘National Projects’ means that there will be no fund crunch. All this was due for a long time , N-E can’t be ignored for more. Railway engineers have been given deadline for completing long standing projects. All the officials are working overtime to conform to deadline. PM is himself in touch with GM of NFR. Railways officials will be held accountable if project is not completed on time right from top. Railway follows strict hierarchy in its workings,accountability can go upto railway board.

A Challenge

Now let’s us discuss how it’s like working in NFR. Before this have a look at pic below.

Amit Jaiswal, IRSE 2011 Batch,
Amit Jaiswal, IRSE 2011 Batch,

He is our senior working as Assistant Executive Engineer in Bhairabi-Sairang Project. Earlier the MG line existed upto Bhairabi(Mizoram) but now a new BG line is to be constructed upto Sarang. He was earlier working as AEN,Asansol but has been posted for 2 years to NFR. Although he works in a condition not very congenial for construction activities, yet he his fully dedicated to his work. According to him, this presents a great learning opportunity from civil engineering point of view.He takes his posting here in a very positive spirit. There are certain areas where we can’t move without security cover. Even we probationers, were given security cover when we moved from one place to another at night. Some sections have higher threat perceptions than others, so security is accordingly given.

Those who take CPWD also come here because along with track conversion,highway construction is also going on. NHAI works side by side Indian Railways because alignment in hilly areas is almost same for both of them. If our Armed forces are ready to gaurd at borders then there should be no complaint from govt. officials about working in inhospitable conditions. As an officer,whether in civil services,engineering services or other central services you should not complain that you are forefront of tackling insurgency challenges or completing infrastructure projects. New regime has made its mind about N-E and those aspirants preparing for central services should make their own ,about working here.

Insurgency and separatism in N-E has been due to complex cocktail of race,ethnicity,international interference and geopolitics .Those areas which lack connectivity have lagged behind from rest of the country. This acts as negative feedback,enforcing discontent and suppressing growth. People and their needs are same everywhere unless channeled in a proper way.

More and more vacancies are going to be created in N-E you could one of them to get your posting here. It will be upto you how you want to take it.

Will you curse your fate or rejoice in the beauty of hills? It’s all a matter of perception.

First week at Indian Railway Institute of Civil Engineering


IRICEN stands for Indian Railway Institute Of Civil Engineering. It is a centralised training institute for IRSE probationers. It is located in Pune city in the posh locality of Koregaon Park. It was started in 1959 as Permanent Way Training School for Civil Engineers. After clearing IES , civil engineers those who get railways start their journey from here only. This institute is our headquarter for next three years of probation.

IRICEN Building
IRICEN Building

Our batch of IRSE probationers were asked to report the IRICEN on 15 December 2014. Accordingly, we made our reservations for Pune.  As I mentioned previously that we were given first class pass to travel to Pune for joining so we didn’t face any major difficulty. Once we reached Pune railway station there was reception desk just outside the station for welcoming us. Staff from IRICEN had arranged vehicles to transport us to IRICEN hostel which is just adjoining to main IRICEN building. Once inside, we were allotted our hostel rooms.When i started moving to my room, one boy took my luggage and lead me towards the room but then i insisted that i will carry the luggage on my own. Actually he symbolized the failure of Indian State in terms of employment and education. He is in no way inferior or lesser being than i am but our society is like such where there is less to envy and more to pity.

IRICEN hostel is the best among all centralized training institutes hostels of Indian Railway. When I opened my room it was equipped with all the facilities.Every thing was in its place just waiting for us. Internet speed is just amazing, it has made everyone crazy here. Railway provides services which are generally not available elsewhere.

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There afterwards we proceeded for the dinner. Let me tell you that mess arrangements are also no ordinary here. Our dining area is big hall where around 150 people can eat at time. Everything was on its place. We just sat there and enjoyed our meal. There are catering staff which take care of your all the needs. Food is of very good quality. You will fall in love with dining facilities here. It is completely different from what you will find in your college mess. So if you want to be here than start studying now.

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Goutam Rahul Roy , IES
Goutam Rahul Roy , IES

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In the first week, we have completed all our joining formalities. Were were also given introduction on important railway works. We were told about organisation and how to behave as an officer. One very special thing was given to us which is only a matter of privilege. Look below.

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The name says it all. This is a first class duty pass given to all the IRSE probationer. Through this we are entitled to travel from anywhere to anywhere in India on duty. We are also entitled to travel in Shatabadi and Rajdhani trains. We also get 6 sets of privilege pass and privilege ticket order which can be used for families. Let me tell you that I feel proud while carrying duty pass as its the sign if becoming an IES officer. We also been instructed not to misuse our official privileges. We can’t do anything which will be regarded as ‘ unbecoming of an officer’. We were also given lessons on manners,etiquette and ceremonies.

It has just been one week at IRICEN. Half of the batch has been sent to NAIR Vadodra and rest of them have been sent to field training. I was overwhelmed by the experience here which has been fulfilling till now,we have to return again here for next phase of training. This is the place where we will be incubated as officer of Indian Railways.

NAIR Batch
NAIR Batch

I am now the part of this mammoth organisation which has been serving the nation through its ups and downs. The feeling i get here is of unseen potential which lies ahead. Next three years represents a big learning opportunity and it will be my constant endeavor to not to waste this wonderful opportunity. Railway provides everything even beyond your expectations ,you just have to give your soul to it and you will enjoy being here. Let me warn you that life in Railways is not easy from any point of view. Challenges are as great as rewards, so if you want to thoroughly enjoy your life then you are welcome.